Exclusive: क्या हम औसत 50 डिग्री तापमान की तरफ बढ़ रहे हैं? ऐसी परिस्थियां, जिसमें मानवीय अस्तित्व ही आ जाएगा खतरे में

क्या इस खतरे से अनजान है दुनिया? 

अब तक के बिंदुओं से इतना तो स्पष्ट हो गया है कि जलवायु परिवर्तन और बढ़ता तापमान, हमारे अस्तित्व के लिए गंभीर विषय है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या हम वास्तव में इस खतरे से अनजान हैं? अगर नहीं तो इस दिशा में क्या काम किए जा रहे हैं।

ऐसा नहीं है कि इस खतरे से वैश्विक संगठन अनजान हैं या फिर इसको लेकर काम नहीं किया जा रहा है। विशेषज्ञों कहते हैं, वातावरण किसी एक देश या महाद्वीप के लिए अलग नहीं है, ऐसे में इसके लिए वैश्विक स्तर पर सतत प्रयास किए जाने की आवश्यकता है। समय-समय पर इसको लेकर सम्मेलन आयोजित किए जाते रहे हैं, जिससे वैश्विक संगठनों को एक मंच पर लाकर इस विषय की गंभीरता और इसकी रोकथाम को लेकर प्रयास किए जा सकें। हालांकि जानकारों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन को लेकर किए जा रहे प्रयास कागजी ज्यादा होते हैं, वास्तविकता में इसका क्रियान्वयन उस स्तर का नहीं है।

पेरिस, जलवायु परिवर्तन सम्मेलन

जलवायु परिवर्तन की गंभीरता को लेकर प्रयास और रोकथाम का लक्ष्य बनाने के लिए साल 2015 में 21वें जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में 196 देशों ने शिरकत की थी। इस सम्मेलन के दौरान वैश्विक स्तर पर बढ़ रहे तापमान को दो डिग्री से नीचे तक सीमित करने का लक्ष्य बनाया गया था। हालांकि क्रियान्वयन के स्तर पर देखा जाए तो यहां ज्यादा काम कागजी ही दिखता है।

इस लक्ष्य को लेकर किए गए विश्लेषण में शोधकर्ताओं ने पाया कि तापमान कम करने का भले ही लक्ष्य बनाया गया है, पर यह कम होने की जगह साल-दर-साल बढ़ता ही रहा है। हाल के शोध में वैज्ञानिकों का कहना है कि इस दशक के अंत तक यानी कि साल 2030 तक कार्बन उत्सर्जन के 16 फीसदी बढ़ने की आशंका है, जिससे तापमान में और बढ़ोतरी आ सकती है। पेरिस समझौते में जो लक्ष्य बनाया गया है उसके के लिए कार्बन उत्सर्जन को 40 फीसदी घटाने की आवश्यकता है।

कितने चिंतित हैं दुनिया के लीडर्स-

1. भारत की प्रतिबद्धता

भारत, वैश्विक मंचों में इस मुद्दे को लेकर अक्सर मुखर रहा है। साल 2021 में ग्लासगो में हुए जलवायु परिवर्तन COP26 शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी ने इस विषय पर अपने लक्ष्य से दुनिया को अवगत कराया था। प्रधानमंत्री ने कहा था- 

”हम साल 2070 तक कार्बन उत्सर्जन को नेट ज़ीरो करने की दिशा में काम कर रहे हैं।” 

नेट ज़ीरो का मतलब कार्बन के उत्सर्जन को खत्म करने से है। चीन साल 2060 जबकि अमेरिका 2050 तक इस लक्ष्य को पाने की दिशा में काम कर रहा है। कई देशों के मुकाबले प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन को लेकर भारत अपनी पीठ जरूर थपथपा सकता है। आंकड़ों के मुताबिक अमेरिका ने साल 2019 में  प्रति व्यक्ति के हिसाब से 15.5 टन और रूस ने 12.5 टन कार्बन उत्सर्जन किया, भारत के लिए यह आंकड़ा दो टन के करीब का ही रहा। 

2. न्यूजीलैंड की प्रतिबद्धता

जलवायु परिवर्तन और  ग्रीनहाउस गैसों के नियंत्रण को लेकर न्यूजीलैंड के प्रयास की विशेषज्ञ सराहना करते हैं। न्यूजीलैंड सरकार ने 2050 तक बॉयोजेनिक मीथेन के साथ अन्य सभी ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन शून्य करने का लक्ष्य रखा है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2020 में न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री जैसिंडा अर्डर्न ने जलवायु परिवर्तन को ‘आपातकालीन स्थिति’ बताते हुए साल 2025 तक कार्बन न्यूट्रल गवर्नमेंट बनाने की कोशिशों को जोर दिया था।

3.अमेरिका की प्रतिबद्धता

अमेरिका भी वैश्विक मंचों पर लगातार इन विषयों को लेकर चर्चा करता रहा है, हालांकि शोध के रिपोर्ट इसके प्रयासों को कागजी ज्यादा बताते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक राष्ट्रपति बनने के बाद से जो बाइडेन अपने पूर्ववर्तियों की तुलना में इसपर ज्यादा आक्रामक जरूर दिखे थे, पर योजनाएं उस हिसाब से चरितार्थ होती कम ही दिखती हैं।

उदाहरण के लिए बाइडेन सरकार ने 2030 तक कार्बन उत्सर्जन में कटौती को लेकर अपनी प्रतिबद्धता पर जोर दिया था, पर आंकड़े इसके विपरीत नजर आते हैं। साल 2035 तक देशभर में 100% स्वच्छ विद्युत ग्रिड बनाने का अभियान चलाया गया था हालांकि पिछले वर्ष की तुलना में देखें तो अकेले व्हाइट हाउस में रोशनी के लिए ही 25 फीसदी अधिक कोयला जलाया  गया।

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